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भगवान शिव से नहीं, नंदी के कान में क्यों बताते हैं भक्त अपनी मनोकामनाएं?

वैसे तो शिव भगवान की उपासना के लिए सप्ताह के हर दिन शुभ होते हैं, लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिव की पूजा-अर्चना विशेष रूप से की जाती है। इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के इस मौके पर भगवान शिव के साथ-साथ उनके वाहन नंदी को भी विशेष रूप से पूजा जाता है। इसके अलावा शिव मंदिर में कई बार देखा जाता है, कि भक्त भगवान शिव के दर्शन के बाद नंदी के कान में कुछ कहते हैं। क्या आप जानते हैं इस परंपरा के पीछे क्या वजह है?

प्रतीकात्मक

 

इसलिए नंदी के कान में कहते हैं मनोकामना

दरअसल नंदी के कान में शिव भक्तों द्वारा कहने की वजह एक मान्यता है। इस बारे में उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा बताते हैं कि कहीं भी अगर शिव भगवान का मंदिर बनाया जाता है तो वहां नदी की स्थापना भी जरूर की जाती है। इसका बड़ा कारण ये है कि नंदी शिव भगवान के परम भक्त हैं। जब भक्त शिव के दर्शन करने जाते हैं तो नंदी की भी पूजा करते हैं और फिर नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। इसके पीछे मान्यता यह है कि - 

‘भगवान शिव एक तपस्वी हैं, लिहाजा वो हर वक़्त समाधि में रहते हैं। ऐसे में हमारी मनोकामना उन तक पहुंच नहीं पाती। ऐसी स्थिति में भक्त अपनी मनोकामना नंदी के कान में कहते हैं, जिसके बाद नंदी ही भक्तों की मनोकामना भगवान शिव तक पहुंचाते हैं।‘

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खेत में मिले थे नंदी

शिवपुराण में बताया गया है कि शिलाद नाम के एक मुनि थे। वे ब्रह्मचारी थे इसलिए उनके पितरों को लगा कि उनका वंश खत्म हो जाएगा। फिर पितरों ने शिलाद को संतान उत्पन्न करने को कहा। ऐसे में शिलाद मुनि ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र मांगा। शिवजी ने मुनि को वरदान दे दिया। एक दिन जब शिलाद खेत जोत रहे थे, तब उन्हें एक बालक मिला। जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा। 

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शिव के ही अंश हैं नंदी 

एक दिन शिलाद के आश्रम में दो मुनि आये। एक का नाम मित्रा और दूसरे का नाम वरुण था। उन्होंने नंदी को देखकर शिलाद से कहा कि यह बालक अल्पायु है। यह सुनकर नंदी महादेव की आराधना करने लगे। नंदी की आराधना से खुश होकर भगवान शिव प्रकट गए और कहा कि तुम्हें मृत्यु से कैसे भय हो सकता है, तुम तो मेरे ही अंश हो। इसके बाद शिव ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।