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अब करवा लें साइबर इंश्योरेंस।

साइबर फ्राड की घटनाएं आए दिन होती रहती है। आईटी फिल्ड और ई—कामर्श के आॅनलाइन कारोबार में तो इसकी वजह से काफी नुकसान उठाना पड़ता है। यह कहें इंटरनेट से मिलने वाली सुविधाएं कभी भी आपको असहज और असुरक्षित बना सकती हैं।जैसे कि ई-मेल या इंटरनेट बैंकिंग एक्सेस के क्रम में मोबाइल फोन या पर्सनल कंप्यूटर का इस्तेमाल होता है। ऐसे काम ज्यादातर आफिस के इंटरनेट या सार्वजनिक वाईफाई के जरिए ही किया जाता है। इससे साइबर खतरे का जोखिम भी बनी रहती है।

इससे बचाव अगर आपके हाथ में है, तो इसकी सुरक्षा के लिए साइबर इंश्योरेंस करवाना भी अच्छा कदम सबित हो सकती है।

साइबर फ्रॉड का शिकार होने से बचाव के लिए कई कंपनियां साइबर इंश्योरेंस लेकर आई है। इनमें बजाज आलियांज, एचडीएफसी मुख्य हैं, जिनकी अलग—अलग खूबियां और शर्तें हैं। जैसे कोई वायरस मैलवेयर अटैक से सुरक्षा की गारंटी देते हैं, तो किसी ने साइबर सिक्योरिटी की कुछ सीमाएं निर्धारित की हुई है। इस कारण इसे लेते वक्त कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है

बाजार में इसके लिए उपलब्ध दो तरह के प्लान में एक बजाज आलियांज 'इंडिविजुअल साइबर सेफ इंश्योरेंस पॉलिसी' है, जबकि दूसरा प्लान 'एचडीएफसी एर्गो का साइबर सिक्यॉरिटी' है। इस तरह की पॉलिसी लेते वक्त हमें तीन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए। इनमें कवर के प्रकार का ध्यान से अध्ययन करना जरूरी होता है। जैसे किस तरह के साइबर अटैक को कवर किया गया है? अटैक के वैसे खतरे की सीमा क्या है? किसी भी तरह के आर्थिक नुकसान की स्थिति में क्लेम की सुविधा क्या मिल सकती है? 

साइबर इंश्योरेंस के सबसे अहम हिस्सा होता है नुकसान पहुंचाने वाले वायरस से संबंधित नुकसान को कवर करना। इसकी सीमा का समझना महत्वपूर्ण है।

बजाज आलियांज साइबर सेफ इंश्योरेंस पॉलिसी में 10 क्लॉज दिए गए हैं और हरेक के साथ सब-लिमिट है। जैसे ई-मेल स्पूफिंग, फिशिंग और सोशल मीडिया कवर को क्रमशः 15 फीसदी, 25 फीसदी और 10 फीसदी तक सीमित किए जाने का प्रावधान है। 

इसी तरह, एचडीएफसी एर्गो की साइबर सिक्योरिटी में भी सब-लिमिट्स हैं, लेकिन मैलवेयर अटैक से सुरक्षा वैकल्पिक रखी गई है। इसके लिए अतिरिक्त रकम चुकानी पड़ सकती है। यह प्लान पांच लाख या उससे ऊपर के एक फैमिली कवर की भी पेशकश करता है। फिशिंग और ई-मेल स्पूफिंग के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान का कवर किया जाता है। पॉलिसी की अवधि में क्लेम की संख्या की कोई ऊपरी सीमा नहीं है, जबकि क्लेम की सीमा अलग—अलग है। जैसे-फिशिंग के कारण होने वाले फाइनैंशल लॉस के लिए लिमिट 25 फीसदी, जबकि ई-मेल स्पूफिंग के कारण होने वाले वित्तीय नुकसान के लिए लिमिट 15 फीसदी है।