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क्या है कुंभ, महाकुंभ और अर्धकुंभ? क्या है इनके पीछे की मान्यता

साल 2019 राजनीती में रुचि रखने वालों और क्रिकेट प्रेमियों के लिए बहुत व्यस्त रहने वाला है, चाहे फिर फिर वो लोकसभा चुनाव के चलते हो, या क्रिकेट वर्ल्ड-कप और आईपीएल की वजह से। लेकिन इसके साथ ही 2019 भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए भी बहुत सुंदर और काफी व्यस्त रहने वाला है। क्योंकि कुछ ही दिन बाद  2019 का कुंभ-मेला शुरू होने वाला है। लेकिन क्या आप जानते हैं भारत में कुम्भ मेले का आयोजन क्यों होता है और यह कितने प्रकार का होता है? चलिए हम आपको बताते हैं।

दरअसल कुछ दिन बाद ही प्रयागराज समेत कुछ अन्य धार्मिक शहरों में हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव कुम्भ मेला शुरू होने जा रहा है, जिसका पहला शाही स्नान 15 जनवरी को होना है। यह कुम्भ मेला 15 जनवरी से 3 मार्च तक चलेगा। इस बड़े धार्मिक उत्सव में भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी कई श्रद्धालु आएंगे। माना जाता है कि कुंभ मेले में स्नान करने वालों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। लेकिन सबसे पहले जानते हैं कुंभ मेले के पीछे की मान्यता क्या है?

प्रतीकात्मक

क्यों होता है कुंभ का आयोजन?

कुंभ का अर्थ होता है घड़ा यानी कलश। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के अंत में जब अमृत कलश निकला तो देवताओं और असुरों के बीच अमृत कलश को लेकर तनातनी शुरू हो गयी। इस तनातनी के दौरान जिन स्थानों पर अमृत की बूंदे गिरी, उन्हीं स्थानों पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। हिन्दू परंपरा के अनुसार कुंभ हिन्दू धर्म का सबसे पुराना और पवित्र धार्मिक मेला है। भारत में तीन प्रकार के कुंभ का आयोजन होता है। कुंभ, महाकुंभ और अर्द्धकुंभ।

कुंभ या पूर्णकुंभ: कुंभ को पूर्णकुंभ भी कहा जाता है। पूर्णकुंभ 12 साल में एक बार लगता है। यह भारत में चार धार्मिक स्थानों पर लगता है। प्रयागराज(पूर्व इलाहाबाद), हरिद्वार, नासिक और उज्जैन। 

महाकुंभ: महाकुंभ हर 144 साल में लगता है। इसका आयोजन प्रयागराज में होता है। जब 12 पूर्णकुंभ संपन्न होते हैं, तब एक महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।

अर्द्धकुंभ: अर्द्धकुंभ अर्थात आधा कुंभ। यह दो पूर्णकुंभ पर्वों के बीच छः वर्ष के