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दिलकश दार्जलिंग को अंग्रेजों ने मात्र 3,000 रुपये में हासिल किया था।

दिलकश मौसम और आवोहवा वाले दार्जलिंग में किस हद तक सेहतमंदी का राज छिपा हुआ है, इसकी जानकारी होते ही ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों ने इसे पाने के लिए जो कुछ किया, वह आज लोगों को हैरत में डाल देता है। ब्रिटिश काल के गजेटियर के अनुसार उसने इसे सिक्किम के राजा से मात्र 3000 रुपये में हासिल कर लिया था। इसके पीछे का तर्क चाय बागान वाले बड़े भूभाग का विकास करवाना दिया था।  

साल 1905 में दर्जलिंग के लिए एक जिला गजेटियर जारी किया गया था। उसके एक अध्याय में इस बात का विस्तार से जिक्र किया गया है। गजेटियर के अनुसार 19वीं सदी की शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने दार्जलिंग के इस भूभाग के साथ सीधा संबंध स्थापित कर लिया था। तब यह सिक्किम के राजा के अधीन हुआ करता था। वह गोरखा लड़ाकों की बढ़ती ताकत से परेशान था। उसके सामने राजा कमजोर पड़ता जा रहा था, जबकि गोरखा सिक्किम और तिस्ता की पश्चिमी एवं दक्षिणी पहाड़ियों को नेपाल का एक प्रांत बनाने पर तुले हुए थे। देश में ब्रिटिश शासन के हस्तक्षेप से गोरखाओं को रोकना संभव हो पाया था। मौजूदा जिला दार्जिलिंग समेत सिक्किम को नेपाल एवं भूटान के बीच एक बफर राज्य के तौर पर कायम रखने में सफलता मिली थी।

अंग्रेजों द्वारा इस मदद के पीछे की एक अन्य घटना भी है। गजेटियर में ही लिखा गया है कि जनरल लॉयड नामक एक ब्रिटिश प्रशासक 18 जनवरी 1829 को जब गोरखा स्टेशन 'दोरजीलिंग' पहुंचा था। बताते हैं कि वहां जाने वाला तब वह इकलौता यूरोपीय व्यक्ति था। उसने वहां छह दिनों तक रहने के बाद महसूस किया कि पहाड़ियों से घिरी वह जगह  सेहतमंदी के लिए काफी अच्छा है। इसे स्वास्थ्य लाभ के लिए विकसित किया जाना चाहिए। साथ यह जगह नेपाल और भूटान जाने का एक तरह से प्रवेश द्वार था।

लॉयड ने अपनी छह दिवसीय यात्रा के बाद बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को इसपर कब्जा पाने का प्रस्ताव दिया। उसने कंपनी को बताया कि इस जगह में देश के समूचे व्यापार को आकर्षित करने की क्षमता है। इसके अलावा नेपाल एवं भूटान जाने में भी सहुलियत मिलेगी। उसके बाद जनरल लॉयड को मौका देखकर सिक्किम के राजा के साथ बातचीत करने का निर्देश मिल गया। सीधे तौर बातचीत पैसे या जमीन के बदले दार्जिलिंग के हस्तांतरण को लेकर की जानी थी।

इस तरह से वर्ष 1835 में का हस्तांतरण बगैर पैसे के किसी शर्त के हो गया। बाद में ब्रिटिश सरकार ने ही वर्ष 1841 में सरकार ने सिक्किम के राजा को मुआवजे के तौर पर 3,000 रुपये का भत्ता देने की घोषणा की। उसे 1846 में बढ़ाकर 6,000 रुपये कर दिया गया।

इस तरह से दार्जलिंग में नया इतिहास लिखने की शुरूआत हो गई। हालांकि अंग्रेजों से सिक्किम के राजा ने भी कुछ अपनी शर्तें मनवाईं। जिसमें रिहाइश बनाने पर रोक मुख्य था। शर्त में विकास के लिए कुछ समुदाय को लाना और नील की खेती में लगे मजदूरों को वहां बसाना भी था। वर्ष 1866 आते—आते दार्जिलिंग में विकास की नई रूपरेखा बन गई। इसकी सीमाओं के भीतर शांति स्थापित होने के बाद प्रगति एवं सभ्यता की नई राह बन गई। इंजीनियरिंग के बेहतरीन नमूने के तौर पर 1981 में दार्जिलिंग कार्ट रोड का निर्माण शुरू किया गया, जिससे रेलवे लाइन बिछाने में सहुलियत मिली। वहां ब्रिटिश शासन में टॉय ट्रेन पर्यटकों को काफी लुभाने वाला साबित हुआ। वहां के चाय बगान की अलग अहमियत से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।