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Kumbh 2019 - कुंभ का मुगलकालीन इतिहास के साथ जानें अखाड़ों का महत्व और इतिहास

जब कभी हम "अखाड़ा" शब्द को सुनते हैं तो हमारे सामने कुश्ती के दंगल का द्रश्य उपस्थित हो जाता है। लेकिन कुंभ में जिन अखाड़ों का आवागमन होता है हालांकि वहां भी जोर आजमाइश होती है लेकिन वहां सिर्फ धार्मिक वर्चस्व की लड़ाई ही होती है। इन अखाड़ों की शाही सवारी में घोड़े, हाथी आदि को सजाकर निकाला जाता है साथ ही तलवार, त्रिशूल से लेकर बंदूक तक का प्रदर्शन किया जाता है। आइये अब कुंभ मेले के इतिहास के बारे में आपको कुछ जानकारी दे दें। 

प्रतीकात्मक

कुंभ का इतिहास - 

कुंभ की शुरुआत किसने की और कब से हुई। इस बारे में इतिहास में कुछ ज्ञात नहीं होता है। लेकिन सबसे प्राचीन उद्धरण सम्राट हर्षबर्धन का मिलता है। जिसको चीन के तीर्थयात्री ह्वेनसांग ने लिखा है। उन्होंने लिखा है की "यह आयोजन सदियों से होता रहा है और यहां आने के लिए किसी प्रकार के निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती है। इस आयोजन में लाखों लोग कुंभ स्थल पर अपने आप भी पहुंचते हैं।" आपको हम बता दें की कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन तथा नासिक में होता है। अर्ध कुंभ का आयोजन प्रत्येक 6 वर्ष में होता है और यह सिर्फ हरिद्वार तथा प्रयाग में ही होता है। कुंभ में भिन्न भिन्न अखाड़े के साधू आते हैं और डेरा डालते हैं। प्रारंभ में सिर्फ चार अखाड़े ही हुआ करते थे लेकिन बाद में वैचारिक मतभेद के कारण उनमें बटवारा होता गया और आज बहुत से अखाड़े कुंभ मेले में आते हैं। 

प्रतीकात्मक

मुगलकाल में कुंभ का साक्ष्य - 

आपको बता दें की 1665 में मुगलकाल में लिखे गए "खुलासातु-त-तारीख" नामक गजट में पहले कुंभ के आयोजन का वर्णन मिलता है। लेकिन कुछ इतिहासकार इसको नहीं मानते तथा वेद और पुराणों के आधार पर कुंभ को सदियों पुराना मानते रहें हैं। इतिहास कार यह भी मानते हैं की जो साधू संत 12 वर्ष में एक बार मिलते थे उनको लगा की बीच में एक बार उनको मिलना चाहिए। अतः वे प्रत्येक 6 वर्ष में मिलने लगे और यहीं से प्रत्येक 6 वर्ष में अर्द्धकुंभ की नींव पड़ी। यूनेस्को ने कुंभ को वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया है।