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हनुमानगढ़ी मंदिर - बेटे के नवजीवन के बाद अवध नवाब ने कराया था जीर्णोंद्धार

उत्तर प्रदेश का अयोध्या नगर एक प्राचीन नगर माना जाता है। अयोध्या का अर्थ वैसे तो " जीता जा सकने वाला क्षेत्र" है लेकिन अथर्ववेद में इस क्षेत्र को "ईश्वर का नगर" बताया गया है। अयोध्या को भगवान श्रीराम की नगरी भी कहा जाता है साथ ही यह मान्यता भी है इस नगर में भगवान हनुमान सदैव निवास करते हैं। यहां जो भी भक्त आते हैं वे भगवान श्रीराम से पहले भगवान हनुमान के ही दर्शन करते हैं। अयोध्या का सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिर "हनुमानगढ़ी मंदिर" है। यह मंदिर राजद्वार के सामने एक ऊंचे टीले पर बना हुआ है। मान्यता है की इस स्थान की एक गुफा में भगवान हनुमान सदैव निवास करते हैं तथा राम कोट और अयोध्या की रक्षा करते हैं। प्रत्येक वर्ष दीपावली की आधी रात को इस मंदिर में भगवान हनुमान का जन्मदिवस मनाया जाता है। यह मंदिर काफी प्राचीन है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मंदिर का जीर्णोंद्धार अवध के नवाब ने कराया था। आज हम आपको इसी हनुमानगढ़ी मंदिर तथा अवध नवाब के फैक्टर को यहां बता रहें हैं।

प्रतीकात्मक

 अवध नवाब ने कराया था जीर्णोंद्धार -

यह घटना दसवीं शताब्दी के मध्य समय की है। उस समय "सुल्तान मंसूर अली" अयोध्या तथा फैजाबाद के नवाब थे। उनका एक ही लड़का था जो किसी कारणवश बीमार हो गया था। बच्चे की बिमारी बढ़ती गई और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं रही। रात गहराने के साथ बच्चे की नाड़ी भी उखाड़ने लगी। नवाब साहब कांप उठे और अंत में उन्होंने भगवान हनुमान से प्रार्थना की और अपना सिर उनके चरणों में रख डाला। पल भर में चमत्कार घटा और बच्चे की धड़कने फिर से चलने लगी। अपने एकमात्र बच्चे के प्राणों की रक्षा के बाद में नवाब साहब ने अपने को भगवान हनुमान को समर्पित कर दिया।

इस घटना के बाद में नवाब साहब ने हनुमानगढ़ी के मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया तथा ताम्रपत्र पर यह लिख कर दिया कि इस मंदिर पर आज से किसी राजपरिवार का अधिकार नहीं रहेगा तथा मंदिर के चढ़ावे पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इसके बाद में नवाब साहव में 12 बीघा जमीन इमली वन तथा हनुमान मंदिर परिसर के लिए दी। भगवान श्रीराम के लंका विजय के बाद में वहां से कुछ विजय चिंह भी लाये गए थे। वे सभी चिंह इस मंदिर में रखे हैं और समय समय पर दर्शन के लिए उनको निकाला भी जाता है।