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सत्संग में निरंकारियों पर हमले से उठे सवाल

निरंकारी समागम में 18 नवंबर को हुए  हमले से तीन निरंकारियों की मौत और 20 के घायल होने के बाद कई सवाल उठ गए हैं। यह हमला पंजाब में सिखों के सबसे प्रमुख धार्मिक शहर अमृतसर से करीब 10 किलोमीटर दूर के एक गांव में स्थित निरंकारी भवन पर तब हुआ जब वहां सत्संग चल रहा था। सैंकड़ों लोग सत्संग में मौजूद थे। चश्मदीदों के मुताबिक दो नकाबपोश हमलावर मोटरसाइकिल पर आए थे और उनमें से एक ने निरंकारी मिशन भवन के गेट पर तैनात सेवादार पर पिस्तौल तानी, जबकि दूसरा भवन के अंदर चला गया। हमलावर ने मंच की ओर ग्रेनेड फेंका, जिसके धमाके में तीन लोग मारे गए।

इस पूरे मामले में आंतकी हमले की नजर से राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) कर रही है, लेकिन इसे लेकर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। कई आशंकाएं पैदा हो गई हैं। 1980 के दशक में निरंकारी और सिखों के बीच हुए संघर्ष से उपजे खालीस्तानी मूवमेंट और खूनी आतंकवाद के दौर की याद ताजा हो आई।

क्या है सिख निरंकारी मिशन?

इन दिनों चलाया जा रहा निरंकारी मिशन बूटा सिंह द्वारा 1929 में पेशावर (अब पाकिस्तान में) में सिख धर्म के भीतर एक पंथ के तौर पर शुरू किया गया था। इस मिशन के अंतरगत सिख धर्म की गुरुग्रंथ साहिब को गुरू मानने की परंपरा  से अलग व्यक्ति को गुरू मानने की परंपरा पर ज़ोर दिया गया था। जबकि सिख समुदाय गुरू ग्रंथ साहिब को अपना गुरू मानते हैं न कि किसी व्यक्ति को। हालांकि सिखों की तरह निरंकारी भी गुरू ग्रंथ साहिब की शिक्षा में विश्वास रखते हैं, लेकिन उनका मानना है कि इसे समझाने के लिए उन्हें किसी व्यक्ति की ज़रूरत है। इसलिए इस काम को उनके प्रमुख या गुरू ही कर सकते हैं।

इसके समर्थक गुरुग्रंथ साहिब को गुरु मानने की परंपरा को नकारते हुए जीवित गुरु को मानने की बात करते हैं। भारत के बंटवारे के बाद दिल्ली में निरंकारियें का मुख्यालय बनाया गया। इस तरह से इसके अब तक छह गुरु हो चुके हैं। वे हैं— बूटा सिंह, अवतार सिंह, बाबा गुरबचन सिंह, बाबा हरदेव सिंह, माता सविंदर हरदेव और माता सुदीक्षा। इस समय माता सुदीक्षा ही निरंकारियों की गुरु हैं।

इस मिशन के गुरू बाबा अवतार सिंह द्वारा रचित वाणी को अवतारवाणी का नाम दिया गया है। सिख विद्वानों का आरोप है कि इसमें सिख संकल्प के साथ छेड़छाड़ की गई है।

विचारधारा का यही मतभेद 1978 में हिंसक हो गया था। तब अमृतसर में निरंकारी मिशन के कार्यक्रम का विरोध कर रहे सिखों पर जबरदस्त गोलीबारी हुई थी, जिसमें 16 लोग मारे गए थे। मरने वालों में तीन निरंकारी और 13 सिख संगठनों के कार्यकर्ता थे।

तब सिखों ने इस पूरी घटना का दोष तत्कालीन निरंकारी मिशन के प्रमुख गुरबचन सिंह को माना गया था।  हालांकि सिख कार्यकर्ता रणजीत सिंह और उसके साथियों द्वारा 24 अप्रैल 1980 में गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद ही पंजाब आतंकवाद का दौर शुरू हो गया था, जो   अगले डेढ़ दशक तक पंजाब के लोग हिंसा का निशाना बनता रहा। उन्हीं दिनों पंजाब में आतंकवाद के प्रमुख चेहरे के रूप में जरनैल सिंह भिंडरावाले का भी उदय हुआ था। भिंडरावाले की पहचान एक सिख कट्टरपंथी के रूप में हुई और उन्होंने निरंकारियों का जबरदस्त विरोध किया।

हालांकि हत्या के मामले में रणजीत सिंह को उम्रक़ैद की सज़ा हुई, लेकिन जिसे बाद में राष्ट्रपति ने माफ़ी मिल गई। कई सालों की सज़ा भुगतने और रिहाई के बाद वे अकाल तख़्त के जत्थेदार भी बनाए गए।

जो भी हो, निरंकारी अपने आप को सिख धर्म से अलग मानते हैं और सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था अकाल तख़्त द्वारा निरंकारियों का बहिष्कार किया गया है। इन दिनों निरंकारी मिशन की 27 देशों में 3000 शाखाएं और करोड़ों अनुयायी हैं। यह नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है। इसके गुरू बाबा हरदेव सिंह रक्तदान किया करते थे। उनसे प्रेरित होकर ही निरंकारी कैंपों में एक दिन में 70 हजार लोगों ने रक्तदान करने का ही विश्व रिकार्ड है।