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फर्जी खबरों के विरूद्ध मुहिम, बीबीसी ने बनाई एक वर्कशॉप की योजना

इन दिनों फेक न्यूज यानी फर्जी खबरों से भारत समेत दूसरे देशों के लोग भी काफी परेशान हैं। इनमें किसी राजनेता के भड़काऊ भाषण, किसी सिलेब्रेटी के निधन, उन्मादित करने वाली अप्रिय घटना, धार्मिक भावना फैलाने वाली अफवाह, घटना की झूठी तस्वीरें इत्यादी हो सकती हैं। चुनावों में तो कई बार इसकी वजह से पासा ही पलट जाता है। इस कारण संप्रदायिक दंगे फैलने तक की नौबत आ जाती है।

अक्सर इसका इस्तेमाल सोशल मीडिया के जरिए किसी को बदनाम करने या किसी के विरूद्ध मुहिम चलाने के लिए किया जाता है। पलक झपकते ही यह ठोस और विश्वसनीय खबर की श्रेणी में आ जाती हैं। जबतक इसकी सच्चाई के बारे में पता चलता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है और भारी नुकसान की आशंका बन जाती है।

हालांकि जो लोग मीडिया को समझते हैं, शिक्षित हैं और उन तक पहुंच रही ख़बरों की विश्वसनीयता का आकलन करते हैं, वे फर्ज़ी ख़बरों को कम फैलाते हैं। इसी सिलसिले में अब फ़ेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ बड़ी मीडिया और आईटी कंपनियां कमर कसने की तयारी कर चुकी है। इसमें एक पहल बीबीसी की भी है। बीबीसी पत्रकारों की टीम ने ब्रिटेन और भारत के स्कूलों में जाकर मीडिया साक्षरता पर वर्कशॉप चलाने की योजना बनाई है। 

बीबीसी के एक प्रोजेक्ट बियोंड फेक न्यूज के एक हिस्से के तौर पर ही 'द रियल न्यूज़' नाम की वर्कशॉप है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में फैल रही ग़लत और फर्ज़ी ख़बरों की समस्या का हल खोजना है। बीबीस का मानना है कि 'द रियल न्यूज़' मीडिया वर्कशॉप के जरिए भारत के स्कूली बच्चों को फ़ेक न्यूज़ को समझने और इससे निपटने के हल खोजने में मदद मिलेगी।

भारतीय टेलीकॉम रेगुलेटरी कमीशन के अनुसार भारत में एक अरब से ज़्यादा सक्रिय मोबाइल कनेक्शन हैं और काफी कम समय करोड़ों लोग ऑनलाइन हो जाते हैं। अधिकतर लोगों के लिए मोबाइल फोन पर  इंटरनेट  इस्तेमाल करने लगे हैं। उन्हें तमाम तरह की खबरें चैट ऐप्स से मिलती हैं,  जिन्हें वे शेयर करते हैं।

यानि कि ये लोगों से जुड़ने का एक अच्छा तरीका बन गया है, लेकिन ये एक ऐसी जगह भी बन चुकी है जहां ग़लत या फ़र्ज़ी खबरें बिना किसी रोक-टोक के तेजी से फैलने लगी हैं। इस तरह से लोगों के पास जानकारी और ख़बरों का सैलाव होता है, जिसमें सच और झूठ में अंतर कर पाना आसान नहीं होता है। इसे ध्यान में रखते हुए ही बीबीसी बच्चों और युवाओं को खबरों को समझना और उनकी सच्चाई का आकलन सिखाने केो महत्वपूर्ण माना है। 

मन में सवाल उठ सकता है कि बच्चे ही क्यों? जबकि चैट ऐप और इंटरनेट का इस्तेमाल हर उम्र के लोग करने लगे हैं। फिर भी बच्चो से  शुरूआत करने की दो वजहें बताई जा गई हैं।

पहली, बच्चे अपने आस-पास के लोगों को प्रभावित कर सकते हैं। उनके प्रभाव में परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त दोस्त और उनके परिवार भी होते हैं। दूसरा कारण यह है कि बच्चे और किशोर उस दौर में बड़े हुए हैं जहां चैट ऐप और इंटरनेट बातचीत का प्रमुख माध्यम बन चुका है।

इसे ध्यान में रखकर ही स्कूलों के लिए वर्कशॉप तैयार की गई है। ऐसा होने से छात्रों को मीडिया और डिजिटल दुनिया के प्रति जागरूक किया जाएगा।  उन्हें उनके फ़ोन से मिलने वाली समाग्रियों को लेकर सचेत किया जाएगा और उनपर सोचने के लिए तैयार कर फर्जी खबरों को फैलाने से रोकने का माहौल तैयार किया जाएगा।

बीबीसी ने इस संबंध में वर्कशॉप चलाने के लिए दिल्ली—एनसीआर के अतिरिक्त अहमदाबाद, अमृतसर, चेन्नई, पुणे और विजयवाड़ा के स्कूलों को भी चुना है। चार घंटे की इस वर्कशॉप को बच्चों के लिए इंटरएक्टिव बनाया गया है, जिसमें गेम्स, वीडियो और टीम एक्सरसाइज़ शामिल किया गया है। अंग्रेज़ी के अलावा उनके लिए हिंदी, तमिल, तेलुगू, गुजराती, मराठी और पंजाबी में भी वर्कशॉप आयोजित की जानी है ।

 

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