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मोदी सरकार बेचेगी शत्रुओं की संपत्ति, जुटाएगी 3000 करोड़

अंग्रजी दैनिक द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान गए लोगों और कंपनियों की संपत्तियों को बेचना का निर्णय लिया है। इन्हें 'शत्रु संपत्तिकहा जाता है। महत्वपूर्ण बात है कि इन संपत्तियों के शेयर बेचकर सरकार तीन हज़ार करोड़ रुपए जुटाएगी।

यह फैसला केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिया गया। क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद के अनुसार शत्रु संपत्तियों के संरक्षक के पास मौजूद शेयरों को बेचा जाएगा। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने इस संबंध में एक क़ानून भी बनाया है। इससे शत्रु संपत्तियों को बेचने का रास्ता साफ़ हो गया है। इन संपत्तियों का बड़ा हिस्सा राजा महमूदाबाद के वंशजों के पास हैजिन्होंने इन्हें बेचने के फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी है।

शत्रु संपत्ति अधिनियम1968 के अनुसार शत्रु संपत्ति का मतलब उस संपत्ति से हैजिसका मालिकाना हक या प्रबंधन ऐसे लोगों के पास थाजो बंटवारे के समय भारत से चले गए थे। सरकार का यह फैसला काफी महत्वपूर्ण हैक्योंकि अब दशकों से बेकार पड़ी शत्रु संपत्ति को बेचा जा सकेगा। इस तरह से शत्रु संपत्ति अध्यादेश 2016 से क़रीब 2050 संपत्तियों का मालिकाना हक़ सरकार को मिल गया है। संसद ने शत्रु संपत्ति (संशोधन और मान्यकरण) अधिनियम 2016 को पारित कर चुकी है।

क्या है शत्रु संपत्ति?

दो देशों में लड़ाई छिड़ने पर 'दुश्मन देशके नागरिकों की जायदाद सरकार कब्ज़े में कर लेती हैताकि दुश्मन लड़ाई के दौरान उसका फ़ायदा न उठा सके। अमरीका और ब्रिटेन ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के नागरिकों की जायदाद को इसी आधार पर अपने नियंत्रण में ले ली थी।

इसी तरह से भारत ने 1962 में चीन1965 और 1971 में पाकिस्तान से लड़ाई छिड़ने पर भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत इन देशों के नागिरकों की जायदाद पर क़ब्ज़ा कर लिया था। इस आधार पर ज़मीनमकानसोनागहनेकंपनियों के शेयर और दुश्मन देश के नागरिकों की किसी भी दूसरी संपत्ति को अधिकार में लिया जा सकता है। भारत सरकार ने अब तक 9,500 शत्रु जायदादों की पहचान की है। इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान नागिरकों की हैं। इनकी क़ीमत 1,04,339 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई है।

शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत शत्रु देश के नागरिकों को इन जायदादों के रखरखाव के लिए कुछ अधिकार भी दिए गए हैं। फिर भी काफ़ी उलझने हैं और बहुत मामले अदालत में लंबित हैं।

वैसे सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 तक कुछ मामलों का निपटारा कर दिया है। इसने अपने फ़ैसले में कहा कि शत्रु संपत्ति का रखरखाव करने वाला कस्टोडियनट्रस्टी की तरह काम करता है. लेकिन शत्रु देश के पास उसका मालिकाना हक़ बरक़रार रहता है।

सरकार ने 2016 में एक अध्यादेश के ज़रिए कस्टोडियन के अधिकार को बढ़ा दिया थालेकिन बाद में उस अध्यादेश को समय पर ख़त्म कर दिया गया था।