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मुस्लिम ने बेटा बनकर किया हिन्दू का अंतिम संस्कार

हमारे देश में वर्षों से एक कहावत चली आ रही है, “हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख-ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई”। इस कहावत में मौजूद प्यार और एकता को हर कोई महसूस कर सकता है। लेकिन कहावत के अलावा ऐसा प्यार और ऐसी एकता हकीकत में बहुत कम ही देखने को मिलती है। लेकिन आज इसी कहावत को सच साबित कर के पश्चिम बंगाल में रहने वाले अशफाक, सभी के लिए एक मिसाल बन चुके हैं। 

अशफाक पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के बनरहट में रहते हैं। वे एक सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। इसी स्कूल में संजन कुमार विश्वास भी पड़ाते थे। लेकिन संजन कुमार साल 2005 में रिटायर हो चुके थे। संजय, अशफाक से काफी बड़े थे। लेकिन दोनों का आपस में खूब भाई-चारा और प्रेम था। हाल ही में संजन कुमार की मृत्यु हुई। चूंकि संजन कुमार के परिवार में केवल उनकी तीन बेटियां थीं, इसलिए अशफाक ने मानवता का धर्म और बेटे की तरह फर्ज निभाते हुए संजन कुमार का अंतिम संस्कार किया। साथ ही सिर व मूंछे मुंडवाए और हिन्दू धर्म के अनुसार परिवार के साथ 11 दिन का शोक भी रखा। 

अशफाक का कहना है कि संजय उनके पिता के सामान थे। उन्हें संजय से बहुत कुछ सिखने को मिला। सबसे बड़ी चीज जो सीखी, वो है मानवता। साथ ही पुराने दिनों को याद करते हुए अशफाक ने बताया कि 

"जब मेरी स्कूल में नियुक्ति हुई। तब कई लोग ऐसे थे जो धर्म के नाम पर मेरी नियुक्ति का विरोध कर रहे थे। लेकिन उस समय संजय जी मेरे साथ खड़े रहे। उसके बाद मुझे स्कूल के पास कहीं ठिकाना नहीं मिला, तो मैं संजय जी के घर पर ही रहा। मैंने उनसे सीखा, कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इसलिए मैंने वही किया, जो उनसे सीखा है"।