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जानें, नागा बाबाओं की दुनियां का रहस्यमय सच

प्रयागराज कुंभ का शुभारंभ 15 जनवरी से हो जाएगा और यह विशाल उत्सव 4 मार्च तक चलेगा। आपको बता दें की यह अर्ध कुंभ है और यह प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल में प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में आयोजित होता है। आस्था से जुड़े इस विशाल उत्सव में नागा साधु सबसे ज्यादा आकर्षण तथा कौतुहल पैदा करते हैं। इन साधुओं को देखने वालों के मन में कई प्रकार के प्रश्न पैदा होते हैं लेकिन उनका उत्तर शायद ही मिल पाता हो। हमने कुछ ऐसे ही सवालों के उत्तर देने के लिए यह खबर लिखी है। हमारे इस आलेख से नागा बाबाओं से जुड़े हुए कई प्रश्नों के उत्तर आपको यहां मिल जायेंगे। आइये अब हम आपको विस्तार से बताते हैं नागाओं की रहस्यमय दुनियां और उनके जीवन के बारे में। 

सिर्फ 7 अखाड़े ही बनाते हैं नागा साधू

कुंभ मेले में नागा साधु लोगों का प्रमुख आकर्षण बनते हैं लेकिन ये लोग अचानक कहां से आ जाते हैं और कहां गायब हो जाते हैं। इस बात को लेकर लोगों में अलग अलग मान्यताएं हैं। कई लोग इस घटना को एक रहस्य के रूप में भी देखते हैं। इन लोगों के अचानक कुंभ में आने तथा अचानक ही गायब हो जाने के पीछे यह मान्यता है कि ये लोह कभी भी आम मार्गो से नहीं आते हैं बल्कि रात के समय में जंगलों के रास्ते से आते हैं। इनका जीवन भी काफी रहस्यवादी माना जाता है। कई लोग इनके जीवन तथा क्रियाओं के बारे में जानकर हैरान हो जाते हैं। सामान्यतः यह माना जाता है कि नागाओं का जीवन आम व्यक्ति से कहीं ज्यादा कठिन होता है। आपको हम बता दें की संतों के 13 अखाड़े हैं और इनमें से सिर्फ 7 अखाड़े जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन ही नागा साधु बनाते हैं। 

वरीयता के आधार पर दिया जाता है पद

जब किसी व्यक्ति की नागा साधु बनने के लिए दीक्षा हो जाती है। तब उसको उसकी वरीयता के आधार पर पद भी दिया जाता है जैसे कोतवाल, महंत या सचिव आदि।  नागा साधुओं का कोतवाल नागा साधुओं तथा अखाड़े के मध्य एक सेतू का कार्य करता है। सुदूर जंगलों में रहने वाले इन नागाओं को कुंभ में आमंत्रित करना हो या कोई आवश्यक सूचना देनी हो। ऐसे सभी कार्य कोतवाल ही करता है। नागा साधू भी अपना श्रृंगार करते हैं लेकिन जैसे ये लोग आम लोगों से बिलकुल अलग किस्म के होते हैं वैसे ही इनका श्रृंगार भी अलग ही होता है। सुबह उठने के बाद नित्य क्रिया तथा स्नान के बाद नागा श्रृंगार करते हैं। ये लोग अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं तथा अपने कानों में बड़े बड़े कुंडल पहनते हैं। इसके अलावा ये लोग अपने शरीर पर रुद्राक्ष की मालाएं धारण करते हैं और अपने साथ में त्रिशूल, तलवार, डमरू या चिमटा जैसी चीजें भी रखते हैं। 

सुदूर हिमालय में करते हैं वास

यह भी मान्यता कि नागा साधू आम लोगों के बीच नहीं रहते हैं बल्कि ये हिमालय में बहुत निर्जन स्थान पर किसी गुफा या कंदरा आदि में निवास करते हैं। इन लोगों के बारे में यह भी सुप्रसिद्ध तथ्य है कि यह लोग धूनी जलाकर साधनारत रहते हैं और किसी एक स्थान पर ज्यादा समय नहीं रहते हैं। इसके अलावा ये लोग हमेशा पैदल ही भ्रमण करते हैं करते हैं। जो साधू जिस अखाड़े से जुड़े होते हैं वे उसी के मुख्य देवता की उपासना करते हैं। इसके साथ ही ये लोग कठोर यौगिक क्रियाएं भी करते हैं। शैव संप्रदाय से जुड़े नागा साधू ध्यान, साधना आदि के अलावा अपने गुरु का बेहद आदर सत्कार भी करते हैं। मान्यता यह भी है कि नागा साधुओं की शुरुआत जगतगुरु शंकराचार्य ने एक सेना के रूप में मुगलकाल में की थी। 

कई कठिन चरणों को पूरा कर बनता है नागा साधू 

 

कई लोग इस बात का विचार करते हैं कि आखिर नागा साधू बनते कैसे हैं। आपको बता दें की नागा साधू कोई भी व्यक्ति सीधे तौर पर नहीं बन सकता है। नागा बनने के पहले उसकी कई कड़ी परीक्षाएं अखाडा परिषद् के मुखिया द्वारा की जाती हैं। इसके बाद उसकी पूरी जानकारी निकाली जाती है मसलन यह व्यक्ति किस पारिवारिक पृष्टभूमि से है, यह साधू क्यों बनना चाहता है अथवा क्या यह साधू बनने लायक है या नहीं। इस प्रकार की सभी जानकारियां निकालने के बाद जब अखाड़ा परिषद संतुष्ट हो जाती है तब उस व्यक्ति को नागा साधू बनने के लिए कड़े प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। इसके लिए उस व्यक्ति को ब्रह्मचर्य की परीक्षा देनी होती है। यह परीक्षा 6 माह से 12 वर्ष तक की हो सकती है। जब इस परीक्षा के बाद अखाड़े का महंत संतुष्ट हो जाता है कि यह व्यक्ति विषय, वासना तथा इच्छाओं से मुक्त है तब उस व्यक्ति को "महापुरुष" का दर्जा दिया जाता है तथा उसको 5 आध्यात्मिक मार्गदर्शक दिए जाते हैं। जिनको पांच परमेश्वर कहा जाता है। इसके साथ ही महापुरुष बने उस व्यक्ति को भगवा, रुद्राक्ष आदि कई वस्तुएं भी दी जाती हैं। महापुरुष बने इस व्यक्ति को अगले चरण में ले जाय जाता है जहां इसको "अवधूत" पद दिया जाता है। अब इस व्यक्ति को अपना मुंडन करा खुद का पिंडदान करना होता है। यह कार्य भी अखाड़े के पंडे ही करते हैं। इस कार्य के बाद ही संसार से नागा बनने वाले व्यक्ति को बैराग्य हो जाता है और पारिवारिक लोग सहित यह सारा संसार उसके लिए मृत प्रायः हो जाते हैं। इसके बाद होती हैं उस व्यक्ति कि अंतिम परीक्षा। इस अंतिम परीक्षा में उस व्यक्ति को नागा रूप में ही अपने अखाड़े के ध्वज के नीचे खड़ा होना पड़ता है। इस अवस्था में उसके एक हाथ में दंड तथा दूसरे हाथ में मिट्टी का वर्तन होता है। 24 घंटे बिना खाये पिए इस अवस्था में खड़ा रहने के बाद अखाड़े के वरिष्ठ लोग इस व्यक्ति का अंग भंग कर देते हैं। इतना होने के बाद वह व्यक्ति संपूर्ण रूप से "नागा साधू" के जीवन में प्रवेश करता है।