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अफगानिस्तान से पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां भारत लाने वाले राजपूत की कहानी

एक समय था जब चम्बल के जंगलों में डकैत फूलन देवी का नाम गूंजता था। इसी दौरान अपने प्रतिशोध का बदला लेते हुए फूलन देवी ने 22 राजपूतों को गोली मार दी। जिसके कुछ समय बाद उसने पुलिस को आत्मसमर्पण कर दिया। फिर 11 साल की सजा काट कर जब फूलन देवी जेल से रिहा हुयी तो राजनीति से जुड़ गयी और समाजवादी पार्टी से दो बार मिर्ज़ापुर की सासंद भी रही। इसी दौरान 25 जुलाई 2001 को फुलन देवी के सरकारी बंगले के बाहर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। इस हत्या के 2 दिन बाद देहरादून पुलिस के सामने एक लड़के ने यह कहते हुए आत्मसमर्पण कर दिया कि " मैंने बेहमई में मारे गए अपने 22 राजपूत भाइयों की मौत का बदला लिया है।"  इस लड़के का नाम था 'शेर सिंह राणा'. इसके बाद फूलन देवी की हत्या का केस चलने तक शेर सिंह राणा को तिहाड़ जेल में रखा गया और यहां से शेर सिंह राणा की ज़िन्दगी में एक नयी कहानी की शुरुवात हुई। 

     करीब 3 साल बाद 17 फरवरी 2004 को शेर सिंह राणा एक फ़िल्मी तरीके से जेल से फरार हो गए। हालांकि 2 साल बाद फिर उन्हें कोलकाता के एक गेस्ट हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन शेर सिंह राणा के फरार होने की वज़ह जब पता चली तो सभी चकित रह गए। 

  

   कुछ साल पहले जब तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह अफगानिस्तान के दौरे से वापस आये तो उन्होंने बताया था कि अफगानिस्तान के गज़नी में मुहम्मद गौरी की कब्र के पास हिन्दुस्तान के सबसे आखिरी हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि भी है। जो मुहम्मद गौरी की कब्र के दर्शन के लिए जाता है, उसे पहले पृथ्वीराज चौहान की समाधि पर चप्पल रखकर अपमान करना पड़ता है। यह सुनकर शेर सिंह राणा ने अपने मन में पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां भारत लाने की ठान ली थी। 

      तिहाड़ से रिहा होने के बाद शेर सिंह ने पहले रांची से फर्जी पासपोर्ट बनवाया। फिर कोलकाता और बांग्लादेश होते हुए अफगानिस्तान पहुंचे। उस समय अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार थी। मतलब कदम कदम पर खतरा था। राणा गजनी पहुंचे तो उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की समाधि का अपमान होते हुए अपनी आँखों से देखा। फिर पूरी तैयारी करने के बाद जान जोखिम में डालते हुए एक रात पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां निकाली और भारत ले आए। इस पूरी घटना को 3 महीने का समय लगा। इस घटना पर लोग यकीन करें इसके लिए राणा ने पूरी घटना की वीडियो भी बनायी। बाद में राणा ने अपनी माँ की मदद से मैनपुरी में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर भी बनावाया, जहाँ उनकी अस्थियां रखी गई। 

      एक पत्रकार से बात करते हुए राणा ने बताया कि तिहाड़ जेल में रहते वक़्त उनके साथ दो तालिबानी आतंकवादी भी थे। जब राणा ने उनसे कहा कि 'हिन्दू सम्राट की समाधि का अपमान करना गलत है और मै उनकी अस्थियां भारत लाऊंगा' तो वो हंसने लगे और कहने लगे कि भारत में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ जो ऐसा कर सके। इस बात से राणा का दृढ़ संकल्प और मजबूत हुआ। जिससे राणा ने इस काम को अंजाम दिया। जिसे सुन हर भारतीय गौरवान्वित होता है।

     2014 में निचली अदालत ने फूलन देवी के हत्या के जुर्म में शेर सिंह राणा को उम्रकैद की सज़ा सुनाई लेकिन 2017 में इसी अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। इसके बाद फरवरी 2018 में शेर सिंह राणा की शादी किसी पूर्व विधायक की बेटी के साथ हुयी। राणा ने दहेज़ में मिलने वाले 10 करोड़ की खदान और 21 लाख रुपये लेने से मना कर दिया और एक सिक्का लेकर शादी की रस्म पूरी की।

नोट- हम किसी के क़त्ल करने या जेल से फरार होने की बात का समर्थन नहीं करते लेकिन इस तरह जान जोखिम में डालकर पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां भारत लाना अपने आप में एक गर्व वाली बात है।