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आईए जानें तीन ईद का मतलब

मुसलमानों द्वारा मनाया जाने वाला 'ईद मिलाद—उन—नबी' के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। अक्सर लोग पूछ बैठते हैं यह कौन सी ईद है। इसे समझने के लिए पहले उसके कुछ शब्द के अर्थ को जान लें। ईद का अर्थ होता है ख़ुशी। नबी यानी इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद (570-632)। इस तरह से  ईद मिलाद-उन-नबी का मतलब है नबी के जन्म की ख़ुशी। यानी कि इस्लाम में कुल तीन तरह के ईद मनाई जाती है।

21 नवंबर को हज़रत मोहम्मद का जन्म के खुशी मनाई गई। उनका जन्म सऊदी अरब के शहर मक्का में साल 570 ईस्वी में इस्लामिक वार्षिक कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल की 12वीं तारीख़ को हुआ था। इस्लामिक कैलेंडर लूनर नियम पर आधारित है इसलिए  इसकी तारीख़ अंग्रेज़ी तारीख़ से अलग होती है। इस बार 12 रबी-उल-अव्वल अंग्रेेजी की तारीख 21 नवंबर को पड़ा, इस दिन  ईद मिलाद-उन-नबी मनाया गया। इसकी देश में राष्ट्रीय छुट्टी घोषित की गई है।

इस्लाम समाज की मान्यता के अनुसार अल्लाह ने अलग-अलग समय पर दुनिया के हर हिस्से में अपना संदेश देने के लिए अपने दूत भेजे हैं, जिन्हें नबी या पैग़म्बर (पैग़ाम यानी संदेश देने वाला) कहा जाता है। हज़रत मोहम्मद अल्लाह के भेजे गए आख़िरी दूत हैं।

इसी वजह से दुनिया भर के मुसलमान हज़रत मोहम्मद के जन्म को तो पवित्र मानते हैं, उनकी मान्यताओं के रूप में विभिन्नता भी है। सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को मनाने को लेकर कोई ख़ास मतभेद नहीं हैं।

इसके अलावा मुसलमान साल में दो और ईद मनाते हैं। वे ईद—उल—फितर और ईद—उल—जोहा के नाम से जाने जाते हैं।

ईद-उल-फ़ितर को अपने यहां बोलचाल की भाषा में मीठी ईद या सेवई वाली ईद कहा जाता है। यह काफी धूमधाम से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला त्योहार होता है। ईद के दौरान सेवई एक ख़ास पकवान के रूप में बनाई जाती है, संभवत: इसीलिए इसे मीठी ईद भी कहते हैं।

ये ईद मुसलमानों के पवित्र महीने रमज़ान की समाप्ति पर मनाई जाती है। रमज़ान के दौरान मुसलमान पूरे महीने रोज़ा रखते हैं और रमज़ान का महीना ख़त्म होने की ख़ुशी में ईद मनाई जाती है।

ईद-उज़-ज़ोहा: दूसरी ईद ईद-उल-अज़हा या ईद-उज़-ज़ोहा कहलाती है। ये ईद इस्लामिक कैलेंडर के आख़िरी महीने ज़िलहिज्ज की दसवीं तारीख़ को मनाया जाता है। इस ईद मुसलमानों के एक पैग़म्बर और हज़रत मोहम्मद के पूर्वज हज़रत इब्राहिम की क़ुर्बानी को याद करने के लिए मनाई जाती है।

मुसलमानों का विश्वास है कि अल्लाह ने इब्राहिम की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ की क़ुर्बानी मांगी। इब्राहिम ने अपने जवान बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में क़ुर्बान करने का फ़ैसला कर लिया। लेकिन वो जैसे ही अपने बेटे को क़ुर्बान करने वाले थे अल्लाह ने उनकी जगह एक दुंबे को रख दिया। अल्लाह केवल उनकी परीक्षा ले रहे थे।

दुनिया भर में मुसलमान इसी परंपरा को याद करते हुए ईद-उज़-ज़ोहा या ईद-उल-अज़हा मनाते हैं। भारत में इसे बक़रीद भी कहा जाता है। इस ईद का संबंध हज से भी है जब दुनिया के लाखों मुसलमान हर साल पवित्र शहर मक्का जाते हैं।