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वो क्रन्तिकारी जिसकी वज़ह से पेशावर काण्ड को आज भी याद किया जाता है

ये कहानी है सन 1930 के पेशावर काण्ड की। तारीख 23 अप्रैल और दिन था बुधवार। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को असेंबली में बम फेंकने के लिए जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद तीनों को फांसी की सज़ा सुनाने की चर्चाएं चल रही थीं। साथ ही सत्याग्रह आंदोलन के चलते लोग सड़कों पर उतर आये थे। इसी दौरान पेशावर में बहुत बड़ी संख्या में पठान प्रदर्शनकारी इकट्ठा हो गए। सभी अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करने लगे। अंग्रेज़ कमांडर ‘रिकेट’ गुस्से से लाल हो चुका था। कमांडर ने गढ़वाल राइफल के सैनिकों को प्रदर्शनकारियों की भीड़ को तीतर बीतर करने को कहा। लेकिन पठानों के हौसले मजबूत थे, वो अपनी जगह से नहीं हटे। कमांडर रिकेट का धैर्य जवाब दे गया, अब कमांडर, पेशावर को भी जलियांवाला बाग़ बना देना चाहता था। कमांडर ने सभी गढ़वाली सैनिकों को आदेश दिया,  गढ़वाली थ्री राउंड फायर। तभी पीछे से एक तेज़ और बुलंद आवाज़ आयी- गढ़वाली सीज़ फायर। सभी सैनिक तुरंत रुक गए और कमांडर के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। सभी प्रदर्शनकारी, सभी सैनिक और अंग्रेज़ कमांडर रिकेट उस चेहरे की तरफ देखने लगे जहाँ से वो आवाज़ आयी थी। वो आवाज़ थी पेशावर काण्ड में गढ़वाल राइफल के सैनिकों का नेतृत्व कर रहे "हवलदार मेज़र चंद्र सिंह गढ़वाली" की।

जीवनी

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के रौणसेरा गांव में हुआ था। वो एक गढ़वाली किसान परिवार में पैदा हुए थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे आर्मी में भर्ती हो गए थे। उन्होंने 1915 में भारत के मित्र देशों के साथ विश्व युद्ध में हिस्सा भी लिया। इस दौरान 1 फरवरी 1915 को उन्हें अंग्रेज़ों ने फ़्रांस भेजा, वहां से फरवरी 1916 को वो वापस आ गए थे। फिर 1917 में चंद्र सिंह ने मेसोपोटामिया के युद्ध में भी हिस्सा लिया, इसमें अंग्रेज़ों की जीत हुयी थी। 1918 में उन्हें बग़दाद की लड़ाई में भी भेजा गया। 

    विश्व युद्ध ख़त्म होते ही अंग्रेज़ कई सैनिकों को सेना से निकालने लगे और कुछ का पद कम करने लगे। विश्व युद्ध से पहले चंद्र सिंह को भी हवलदार बना दिया गया था, लेकिन बाद में इन्हें भी हवलदार से सैनिक बना दिया गया। जिसके कारण उन्होंने सेना छोड़ने का मन बना लिया। फिर अधिकारियों द्वारा उन्हें तसल्ली दी गयी कि इस तरक्की का ख्याल रखा जाएगा और चंद्र सिंह को कुछ दिन की छुट्टी पर भेज दिया गया। इस दौरान चंद्र सिंह पहली बार गाँधी जी के संपर्क में आये। 

    कुछ समय बाद चंद्र सिंह की बटालियन को 1920 में बजीरिस्तान भेजा गया और इसके बाद फिर से उन्हें पद वापस दे दिया गया। वहां से आने के बाद वो आर्य समाज के कार्यकर्ताओं से मिले, इससे चंद्र सिंह के दिल में स्वदेश प्रेम जाग्रत हुआ। फिर इन्हें खैबर दर्रे के पास भेजा गया। इस समय तक चंद्र सिंह, मेज़र हवलदार का पद पा चुके थे। 

   1930 के दौरान देश में सत्याग्रह का शोर मचा हुआ था। साथ ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेज़ हुकूमत द्वारा फांसी दी जाने की बातें चल रही थी। देश में जगह-जगह आंदोलन चल रहा था। इसी दौरान चंद्र सिंह को उनकी बटालियन के साथ पेशावर भेजा गया। 23 अप्रैल 1930 को अंग्रेज़ अधिकारी के आदेश के बाद भी जब उन्होंने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से मना कर दिया तो उनकी बंदूकें वापस ले ली गयी और उसके बाद अंग्रेज़ों ने खुद प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाई। फिर चंद्र सिंह को 14 साल के कारावास की सज़ा सुनाई गयी। लेकिन 11 साल के बाद ही उन्हें आज़ाद कर दिया गया। पेशावर काण्ड की इस घटना के बाद गढ़वाली बटालियन को एक ऊँचा दर्जा प्राप्त हुआ और इसी के बाद से चंद्र सिंह का नाम 'चंद्र सिंह गढ़वाली' पड़ा। 

   इसके बाद चंद्र सिंह गढ़वाली कई आन्दोलनों में गांधी जी के साथ रहे। 1942 में इलाहाबाद में रहकर उन्होंने 'भारत छोड़ो आंदोलन' में सक्रीय भूमिका भी निभाई। इसके लिए फिर उन्हें 3 साल की जेल हुई थी। 

  1 अक्टूबर 1979 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का निधन हुआ और इस तरह देश के एक महान सपूत ने दुनियां से विदा ले लिया। 1994 में उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया।