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क्यों होता है टीपू सुल्तान का विरोध, कारण जानें।

10 नवंबर को मैसूर के राजा रहे टीपू सुल्तान की जयंती मनाई जाती है, लेकिन इस साल इस जयंती को लेकर विरोध की आवाज भी उठी। मैसूर का शेर कहलाने वाले टीपू की जयंती विवादित हो गया, जबकि इसकी शुरुआत कांग्रेस के शासन में हुई थी।

यानि कि कर्नाटक सरकार ने 18वीं सदी में मैसूर साम्राज्य के शासक रहे टीपू सुल्तान की जयंती मनाई, वहीं भाजपा और कई हिंदू संगठनों द्वारा दी गई विरोध प्रदर्शन की धमकी दी गई। टीपू को ‘धार्मिक रूप से कट्टर’ करार देते हुए भाजपा की प्रदेश इकाई ने जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार से टीपू जयंती नहीं मनाने को कहा। भाजपा की नजर में टीपू को जयंती महिमामंडित की योजना भर है। इसे ध्यान में रखते हुए कर्नाटक के कई जिलों में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई। कई शहरों में सुरक्षा को देखते हुए धारा 144 लगाई गई।

विरोध प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। हालांकि कर्नाटक में 2015 में पहली बार आधिकारिक तौर पर 'टीपू जयंती' मनाई गई थी। उसके बाद कोडागू जिले में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और हिंसा हुई थी। इस बार भी कुछ संगठनों की ओर से कई शहरों में बंद का आह्वान किया गया और विरोध प्रदर्शन किए गए।

इतिहास में दर्ज जानकारी के अनुसार मैसूर पर शासन करने वाले टीपू सुल्तान का नाम इतिहास में वीर योद्धा के तौर पर दर्ज है, जिसने अपने राज्य की रक्षा के लिए युद्धभूमि में ही जान दे दी थी। जबकि अब ऐसा क्या हो गया है कि इस योद्धा को याद करने के कार्यक्रमों का विरोध हुआ? और तो और टीपू सुल्तान की इस छवि से अलग एक अन्य छवि पेश कर दी गई?

इस जयंती को लेकर भाजपा का मानना है कि कर्नाटक सरकार मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए टीपू सुल्तान के जन्म का जश्न मनाती है, लेकिन सवाल ये है कि इसका विरोध क्यों किया गया? उसके पास इसके क्या आधार हैं?

इस बारे में आरएसएस से जुड़े एक नेता का कहना है, "टीपू सुल्तान ने अपने शासन के दौरान न सिर्फ हिन्दू मंदिरों और ईसाइयों के चर्चों पर हमला किया, बल्कि हिन्दुओं का धर्मांतरण भी किया। टीपू के शासन काल में हिन्दुओं के मंदिर तोड़े गए और हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया।" हालांकि बताते हैं कि इस बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य होने का तथ्य भाजपा से जुड़े संगठनों के पास नहीं है।

इतिहास की पुस्तकों और लेखों के तथ्य के अनुसार टीपू सुल्तान न सिर्फ एक वीर शासक था, बल्कि उसने अपने शासन काल में कृषि-व्यवस्था में बड़े सुधार किए। उनके द्वारा कई हिन्दू मंदिरों का जीर्णोद्धार करावाया गया, जिसमें श्रृंगेरी मठ का नाम खासतौर पर लिया जाता है।

इतिहास के जानकारों के मुताबिक, टीपू सुल्तान को न सिर्फ वीर योद्धा और राष्ट्रभक्त शासक के तौर पर जाना जाता है, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक के तौर पर भी याद किया जाता है। भाजपा का विरोध करने वालों का कहना है कि टीपू सुल्तान की कथित हिन्दू विरोधी छवि हाल के कुछ वर्षों में राजनीतिक कारणों से गढ़ी गई है, जिसमें ऐतिहासिक तथ्य नहीं है।

सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी, नांजनगुंडा, श्रीरंगपट्टनम, कोलूर, मोकंबिका के मंदिरों को सरकारी खजाने से काफी धन और जेवरात दान दिए और इन्हें सुरक्षा मुहैया कराई थी। टीपू के साम्राज्य में हिंदू बहुमत में थे और  संभवत: अपने इन्हीं कार्यों के चलते वह काफी लोकप्रिय भी था।

 

इसके अतिरिक्त टीपू सुल्तान की गणना भारत के कुछ वैसे शासकों में की जाती है, जिसे अपने समय से आगे देखने वाला माना जाता है। टीपू द्वारा लड़ी गई कई लड़ाइयों में में अंग्रेजों से लड़ी चार बड़ी लड़ाइयां शामिल हैं। उसके द्वारा किए गए समाजसुधार के कई काम में शराबबंदी भी शामिल है। टीपू को गाय से प्रेम और गायों की कई प्रजातियों को विकसित करने के लिए भी जाना जाता है। यही नहीं भारत में मिसाइल या रॉकेट टेक्नोलॉजी की शुरूआती जानकारी टीपू और हैदर अली द्वारा लाई गई बताई जाती है।