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अगर कुत्ते की वफ़ादारी पर शक है, तो जरूर पढ़े दुनिया के सबसे

प्रतीकात्मक

यूँ तो जानवर सभी अच्छे होते हैं जब तक कि उनसे अच्छा व्यवहार करते रहो। लेकिन जानवरों में सबसे अच्छा और वफादार माना जाता है "कुत्ता" और कुत्ता एक ऐसा जानवर है जिसे सबसे ज्यादा लोग पालते हैं। आपको भी कुत्ते पालने का शौक होगा और आपने बहुत से कुत्ते पाले भी होंगे। लेकिन जिस कुत्ते की कहानी हम आपको बताने जा रहे हैं, वह दुनिया के सबसे वफ़ादार कुत्तों में से एक है।

  अगर आप जानवरों को पालते होंगे तो आपको पता होगा कि किसी जानवर जिससे लगाव हो जाता है उससे बिछड़कर हमें कितना अधिक दुःख होता है। लेकिन आपको बता दें कि जितना दुःख हमें जानवरों से बिछड़ने पर होता है उतना ही जानवरों को भी होता है। बस फर्क इतना रह जाता है कि हम तो अपना दुःख बयां कर देते हैं लेकिन जानवर ऐसा नहीं कर पाते। एक ऐसी ही कहानी है "हचिको" की। जिसने 'जापान' के 'ओडेट' शहर में रेलवे स्टेशन के बाहर अपने मालिक "हाइड्साब्यूरो युएनो" (Hidesaburō Ueno) का 9 साल से भी ज्यादा देर तक इंतज़ार किया। जानिये पूरी घटना....,

हाइड्साब्यूरो 'टोक्यो यूनिवर्सिटी' में 'एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट' के प्रोफेसर थे। प्रोफेसर 1924 में एक 'Akita Dog' अपने घर लेके गए। जिसका नाम उन्होंने "हचिको" रखा। हचिको तब तक एक साल का हो चुका था। प्रोफेसर को पढ़ाने यूनिवर्सिटी जाना पड़ता था। इसलिए वो ओडेट में 'शिबुया स्टेशन' से ट्रेन में जाते थे। हचिको भी हमेशा प्रोफेसर के साथ स्टेशन तक जाता और शाम को जब तक प्रोफेसर जाते उनका इंतज़ार स्टेशन पर करता। ऐसे में हचिको और प्रोफेसर में बहुत गहरा रिश्ता हो चुका था। ये हचिको की हमेशा की आदत बन चुकी थी। हमेशा प्रोफेसर के साथ स्टेशन तक जाना फिर उनके वापिस आने तक स्टेशन पर इंतज़ार करना और फिर उनके वापिस आने पर उनके साथ घर आना।

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   एक दिन फिर प्रोफेसर और हचिको दोनों घर से निकले। प्रोफेसर यूनिवर्सिटी गए और हचिको स्टेशन पर उनका इंतज़ार करने लगा। लेकिन उस दिन अचानक प्रोफेसर की यूनिवर्सिटी में पढ़ाते वक़्त 'सेरेब्रल हेमरेज' एक प्रकार के ब्रेन हेमरेज से मौत हो गयी। जिससे प्रोफेसर वापिस शिबुया स्टेशन पर कभी ना सके। लेकिन ये बात हचिको कैसे समझता। वह उसी तरह से प्रोफेसर का शिबुया स्टेशन पर इंतज़ार करता रहा। सर्दी आयी, गर्मी आयी, बरसात आयी लेकिन हचिको अपने मालिक का इंतज़ार फिर भी करता रहा। वह घर गया, बाकी और जगह गया जहाँ प्रोफेसर मिल सकते थे लेकिन फिर भी उसे प्रोफेसर ना मिले। प्रोफेसर का एक स्टूडेंट 'हीरोकीची' था। जिसने Akita Dog प्रजाति पर रिसर्च की थी। जब हीरोकीची ने हचिको की कहानी सुनी तो उसने हचिको की कहानी पर बहुत से article पब्लिश किये। उन्ही में से एक जापान के अखबार 'अशाही सिम्बन' में पब्लिश हुआ तो बहुत लोगो को हचिको के बारे में पता चला। उसके बाद जब लोगों ने हचिको की वफ़ादारी देखी तो सभी चकित रह गए। फिर सभी हचिको को कुछ खाने को दे देते थे। लेकिन हचिको शिबुया स्टेशन पर बैठकर हमेशा अपने मालिक का इंतज़ार करता रहा। इसी तरह 9 साल 9 महीने और 15 दिन तक अपने मालिक का इंतज़ार करते-करते 8 मार्च 1935 को हचिको मर गया।

   हचिको के मरने के बाद उसके फर को निकाल लिया गया जो आज भी 'नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ जापान' में मौजूद है। हचिको का शरीर उसके मालिक हाइड्साब्यूरो की कब्र के पास ही दफनाया गया। हचिको की याद में ओडेट शहर के शिबुया स्टेशन के बाहर अपने मालिक का इंतज़ार करते हचिको का कांस्य से पुतला भी बनाया गया। 2009 में हचिको पर आधारित "Hachi A Dog's Tale" नाम की फिल्म भी बनी। जिसे देखकर आप हचिको की वफ़ादारी का अंदाज़ा लगा सकते हैं। 9 मार्च 2015 को टोक्यो यूनिवर्सिटी के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट ने एक और कांस्य की मूर्ति बनायी। जिसमे हचिको को उसके मालिक से मिलते वक़्त बताया गया है। इस मूर्ति में हचिको अपने मालिक हाइड्साब्यूरो पर कूद रहा है और दोनों बहुत खुश हैं।