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किसकी बनेगी मध्यप्रदेश में सरकार?

यह कहना गलत नहीं होगा कि मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव बेरोजगारों के लिए साधारण सी उम्मीद भर है। चुनाव मैदान में उतरी हर पार्टी, चाहे वह बीजेपी हो या फिर कंग्रेस सभी बेरोजगारों को नौकरी और रोजगार के सपने दिखाने में जुटी है। उनके उम्मीदवारों को रोजगार एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। वे युवा मतदाताओं को चुनाव में जीत होने पर इसे दूर करने के आश्वासनों की घूंट पिलाने में जुटे हैं। यानी कि रोजगार बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है।

उम्मीदवार जानते हैं कि युवा मतदाताओं के दिमाग में इस वक्त सिर्फ और सिर्फ नौकरी ही अहम समस्या है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी से हताश होकर 2015 में राज्य के 579 युवाओं ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया था, जो किसी राज्य में आत्महत्या की सबसे ज्यादा तादाद है। यह आंकड़ा तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात में हुई आत्महत्या की घटनाओं के मुकाबले सबसे ज्यादा है।

बेरोजगार की अगर रेटिंग की जाए तो पता चलेगा कि मध्य प्रदेश में रोजगार की स्थिति 10 में से 3-4 दर्जे पर आएगी। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक मध्यप्रदेश की 7 करोड़ से अधिक आबादी में से 15-24 साल उम्र वर्ग के 19 फीसदी से अधिक लोग नौकरी ढूंढ रहे हैं। यदि 18 से 40 साल उम्र के बेरोजगारों पर नजर डालें तो यही आंकड़ा लगभग 37 फीसदी है। इस वक्त मध्य प्रदेश के 5.03 करोड़ वोटरों में से युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों की संख्या अधिक है। युवाओं की बढ़ती आबादी एक बड़ा वोटबैंक चुका है, जिसे बीजेपी और कांग्रेस हर हाल में भुनाना चाहती है।

विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कई वायदे किए हैं। कांग्रस का वादा है कि कि नए उद्योग या उद्योग में हो रहे विस्तार के दौरान राज्य के युवाओं को  हर नौकरी पर 25 फीसदी या 10,000 रुपये का वेतन भत्ता दिया जाएगा। पार्टी ने टूरिस्ट गाइड और वकील जैसे पेशेवरों को अपने काम में पांच साल तक टिके रहने के लिए पांच सालों तक 4,000 रुपये प्रतिमाह फीस देने का वादा किया है। 

दूसरी तरफ सत्तासीन बीजेपी ने मध्य प्रदेश के युवाओं को एक साल में 10 लाख नई नौकरियां देने का वादा किया है। उनके स्वरोजगार के लिए विभिन्न विकल्प देने की बात भी कही है। सच तो यह है कि करीब 57 लाख युवा नौकरी ढूंढ रहे हैं, जबकि 2 फीसदी से कम लोगों को ही किसी तरह का रोजगार मिल पाया है।

बेरोजगार युवाओं का आरोप है कि सरकारी नौकरियां खत्म हो चुकी हैं, जबकि निजी क्षेत्र कोई बड़े विकल्प नजर नहीं आता है। स्वरोजगार देने वाली राज्य सरकार की योजनाएं जैसे मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना के लिए बैंक गारंटी मुक्त ऋण देने से हिचकते हैं।