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मैंने आज खो दिया अपना सहयोगी और दोस्त : प्रधानमंत्री-मोदी

नरेंद्र मोदी सरकार ने आज एक केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार (59) को खो दिया। उनका 12 नंवबर को सुबह एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले कुछ महीनों से फेफड़े के कैंसर से जूझ रहे थे। अमेरिका और ब्रिटेन में इलाज कराने के बाद वह हाल में ही बेंगलुरु लौटे थे। उनका बाद में यहां शंकरा अस्पताल में उपचार चल रहा था। शंकरा अस्पताल के निदेशक नागराज के अनुसार अनंत कुमार ने तड़के दो बजे आखिरी सांस ली। 

मोदी सरकार में कुमार के पास दो मंत्रालय की जिम्मेदारी थी। वे 2014 से रसायन एवं उर्वरक मंत्री थे। इसके अलावा उन्हें जुलाई 2016 में संसदीय मामलों की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। अनंत कुमार वाजपेयी सरकार में मार्च 1998 से अक्टूबर 1999 तक नागरिक उड्डयन मंत्री भी रहे।

उनका जन्म 22 जुलाई 1959 बेंगलुरु में एक मध्यम वर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा अपनी स्नातक मां गिरिजा एन शास्त्री के मार्गदर्शन में पूरी हुई। उनके पिता नारायण शास्त्री रेलवे के कर्मचारी थे।

कुमार ने कला एवं कानून में स्नातक की पढ़ाई की, लेकिन सार्वजनिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर की। इस सिलसिले में वे परिषद के प्रदेश सचिव और राष्ट्रीय सचिव भी रहे। उन्होंने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल लगाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया था। तब उन्हें करीब 30 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था। 

राजनीति में बड़ा अवसर 1987 में मिला। वे भाजपा में शामिल हो गए और उन्हें कभी प्रदेश सचिव, कभी युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष तो कभी महासचिव और राष्ट्र सचिव की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। ।

कुमार के निधन पर शोक प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘‘मैं अपने महत्त्वपूर्ण साथी एवं मित्र के निधन से बेहद दुखी हूं।’’ उन्होंने कुमार को असाधारण नेता बताया, जो युवावस्था में ही सार्वजनिक जीवन में आए और काफी लगन और सेवा भाव से समाज की सेवा की। उन्होंने कहा कि वह अपने अच्छे कार्य के लिये हमेशा याद किये जाएंगे।

गृह मंत्रालय के अनुसार अनंत कुमार के निधन पर देशभर में आज राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। कर्नाटक में तीन दिन का शोक घोषित किया गया है। कर्नाटक की राजनीति में उनका अहम योगदान था और वह बेंगलुरु दक्षिण से 1996 से ही लगातार 6 बार लोकसभा चुनाव जीतते आए थे।

वे न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृढ़ विचारक, संगठन के मजबूत स्तंभ, बेंगलुरु के “सबसे ज्यादा पसंद” किए जाने वाले सांसद थे, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में कन्नड़ में भाषण देने वाले पहले व्यक्ति। 

अपनी राजनीतिक निपुणता और उसमें गहराई तक समझ रखने के कारण ही वे हमेशा भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में बने रहे। चाहे वह अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी का दौर रहा हो या फिर अभी नरेंद्र मोदी के समय का।