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सुहागिन महिलाओं का वैलेंटाइन, जो 13 दिन तक चलता है

बिहार राज्य बहुत सी प्राचीन परंपराओं को आज भी साथ लिए हुए हैं। बात चाहे छठ पूजा की हो या अन्य किसी पर्व की बात हो बिहार में एक अलग ही छटा दिखाई पड़ती है। बिहार का मिथिलांचल क्षेत्र भी अपने में गहरा इतिहास लिए बैठा हैं। यही वह धरती है जहां देवी सीता के पिता महाराज जनक का राज्य था। मिथिलांचल में एक ऐसी ही परंपरा आज भी प्राचीन समय से जारी है जो प्रेम की प्रतीक है। इस को आज के समय में आप "विवाहित महिलाओं का वैलेंटाइन" । यह भी कह सकते हैं। यह परंपरा "मधुश्रावणी" कहलाती है। इस परंपरा में विवाहित महिलाएं विशेष पूजन करती हैं और यह पूजन उनके पति के प्रति प्रेम का प्रतीक होता है। इस पूजन में विशेष रूप से नवविवाहिताएं ही भाग लेती हैं। 

प्रतीकात्मक

 

प्रकृति से पूजन का है गहरा नाता - 

इस पूजन का प्रकृति से गहरा नाता है। यह पूजन 13 दिन तक चलता है। इस पूजन को नवविवाहिताएं अपने मायके में ही करती हैं। पूजन प्रारंभ करने से पहले मिट्टी के नाग-नागिन तथा उनके पांच बच्चे बनाये जाते हैं। इसके बाद हल्दी से गौरी देवी की प्रतिमा निर्मित की जाती है। सुवह के समय नवविवाहिताएं फूल तथा शाम के समय पत्ते तोड़ने के लिए जाती हैं। मिट्टी तथा हरियाली से जुड़ा यह पूजन पत्नी का पति के प्रति प्रेम को दर्शाता है। मान्यता है की इस पूजन को करने से विवाहित महिलाओं के पति की आयु बढ़ती है। इस पूजन के प्रारंभ होने से पहले ही विवाहिता महिलाओं को उनके ससुराल से श्रृंगार पेटी तथा नए कपड़े भेजे जाते हैं।

प्रतीकात्मक

 

फूल पत्ते तोड़ते समय तथा पूजन में कथा सुनते समय विवाहित महिलाओं को एक ही साड़ी पहननी होती है। पूजन करने के बाद में महिलाएं गीत भी गाती हैं। इस पूजन में 7 तरह के पत्ते तथा अलग अलग तरह के फूलों का उपयोग किया जाता है। वैलेंटाइन जहां सुवह से शुरू होकर शाम तक ख़त्म हो जाता है वहीँ प्रेम का जीवंत प्रतीक यह भारतीय परंपरा का पर्व लगातार 13 दिन तक चलता है। इससे पाश्चात्य तथा भारतीय परम्पराओं में अंतर का स्पष्ट पता लगता है।