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जन्मदिन विशेष-आखिर ओशो को क्यों कहा जाता था "सेक्स गुरु"

प्रतीकात्मक

11 दिसंबर को ओशो का जन्मदिन उनके अनुयायी बड़े महोत्सव के रूप में दुनिया के अलग अलग हिस्सों में मनाते हैं। लेकिन ओशो का जीवन बेहद उपद्रव से भरा रहा। ओशो के जितने अनुयायी बढे उतने ही उनके आलोचक भी बढे। आज भी ओशो लोगों के लिए एक रहस्यमय व्यक्ति हैं। कुछ लोग उनको एक दार्शनिक मानते हैं तो कुछ लोग उनको विद्वान व्यक्ति के रूप में देखते थे। ओशो एक बड़े तर्कशील व्यक्ति थे, उनके पास हर बात का जबाब होता था इसलिए बहुत से लोग उनको एक श्रेष्ठ तर्क शास्त्री भी मानते हैं। इन सबसे अलग कुछ ऐसे लोग भी हैं जो उनको "सेक्स गुरु" भी कहते हैं। आज हम इसी बात पर चर्चा करेंगे कि ओशो को आखिर सेक्स गुरु का तमगा क्यों दिया गया। आखिर ऐसा क्या था कि ओशो समाज के तथाकथित और चुनिंदा सभ्य लोगों के लिए सेक्स का प्रतिरूप बन गए हैं। आखिर ओशो के प्रति तत्कालीन समाज में बिद्रोह कि आवाजे क्यों उठने लगी थीं। ऐसे ही कुछ प्रश्नों के उत्तर आपको यहां मिलेंगे। आइये मोटे तौर पहले ओशो के प्रारंभिक जीवन को जानते हैं। 

मध्यप्रदेश में हुआ था ओशो का जन्म

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ओशो का जन्म मध्य प्रदेश के रायसेन के कुचवाड़ा में 11 दिसम्बर, 1931 को एक जैन परिवार में हुआ था। ओशो का असल नाम "चंद्र मोहन जैन" था। कुछ बड़ा होने के बाद वे अपने दादा दादी के साथ रहने लगे थे। पढ़ाई करते हुए वे एक बिद्रोही किशोर के रूप में बड़े हुए। कॉलेज के समय से ही उन्होंने समाज की अलग अलग परम्पराओं तथा अनेक धर्मों की रीतियों पर प्रश्न उठाना शुरू कर दिया था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे जबलपुर विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त हो गए। ओशो ने रहस्यमय तरीके से ज्ञान पाने का वर्णन भी अपने प्रवचन में किया था। उनके अनुसार उन्होंने 21 वर्ष कि अवस्था में ज्ञान प्राप्त कर लिया था। कुछ समय बाद उन्होंने प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़ दी तथा एक आध्यात्मिक गुरु तथा मार्गदर्शक के रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिया। इस कार्य के चलते ही वे न सिर्फ भारत में बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रसिद्ध हुए। 

आखिर क्यों कहा जाता है ओशो को "सेक्स गुरु"

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जैसे जैसे ओशो एक धार्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध होते चले गए। वैसे वैसे उनके आलोचक भी बढ़ते चले गए, खासकर भारतीय समाज में। असला में ओशो अपनी बातों को सभी के सामने बिना किसी डर या हिचकिचाहट के सहज रूप में रखते थे। उन्होंने अपने प्रवचनों में जीवन के हर पक्ष पर सहज और सरल तरीके से बोला है। इसी क्रम में उन्होंने सेक्स पर भी अपने विचार रखे लेकिन तत्कालीन समाज को उनके विचार और खुलेआम सेक्स पर बोलना पसंद नहीं आया। इसके बाद भी ओशो ने सेक्स के बारे में अपने अनुयायियों के सामने बहुत से प्रवचन कहे तथा सहज और सरलता से सभी को समझाया। ओशो कहते थे की "समाज लोग सेक्स से मुक्त होकर समाधी का आनंद उठा सकें। राम से मानव तब ही मिल सकता है जब वह "काम" से ऊपर उठ जाएं।" उनके सेक्स के ऊपर दिए गए प्रवचनों को एक किताब के रूप में संजोया गया। जिसका नाम "संभोग से समाधी की और" है। यह पुस्तक जब बाजार में आयी तो यह बेहद विवादस्पद हो गई। आज भी यह पुस्तक बहुत चर्चित है। इस पुस्तक के आने के बाद ओशो के आलोचकों ने अपनी धारणा को बदल दिया यानि अब तक ये लोग जो ओशो को समाज का बिद्रोही कहते आ रहे थे वे अब उनको "सेक्स गुरु" कहने लगे थे। यहीं से ओशो सेक्स गुरु के रूप में फेमस हुए थे लेकिन ओशो ने कभी ऐसे आलोचकों की परवाह नहीं की और वे लगातार अपने कार्य में लगे रहे। ओशो ने अपने जीवन में अनेक देशों की यात्रा की और दुनियां के बहुत से हिस्सों में आज उनके अनुयायी रहते हैं। 19 जनवरी 1990 को भारत के अपने पुणे आश्रम में ओशो ने अपना शरीर महज 58 वर्ष कि अवस्था में छोड़ दिया था। आज भले ही वे हमारी दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनका साहित्य, उनके प्रवचन, उनके द्वारा बनाई गई ध्यान कि विधियां आज भी हमारी दुनियां में हैं। उनके अनुयायी 11 दिसंवर को प्रति वर्ष आनंद और अहोभाव में भरकर अपने गुरु ओशो का जन्मदिन सेलिब्रेट करते हैं। आइये जानते हैं ओशो के द्वारा सेक्स पर दिए गए कुछ विचारों के बारे में। 

 ओशो के सेक्स पर कुछ विचार

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1 - सेक्स. से संबंधित किसी नैतिकता का कोई भविष्य5 नहीं है। सच तो यह है कि सेक्सा और नैतिकता के संयोजन ने नैतिकता के सारे अतीत को विषैला कर दिया है। नैतिकता इतनी सेक्स  केंद्रित हो गई कि उसके दूसरे सभी आयाम खो गये—जो अधिक महत्व।पूर्ण है। असल में सेक्स  नैतिकता से इतना संबंधित नहीं होना चाहिए। सच, ईमानदारी, प्रामाणिकता, पूर्णता—इन चीजों का नैतिकता से संबंध होना चाहिए। चेतना, ध्यादन, जागरूकता, प्रेम, करूण—इन बातों का असल में नैतिकता से संबंध होना चाहिए।

2 - संभोग और समाधि के बीच एक सेतु है, एक यात्रा है, एक मार्ग है। समाधि जिसका अंतिम छोर है और संभोग उस सीढ़ी का पहला सोपान है, पहला पाया है।

3 - प्रेम की सारी यात्रा का प्राथमिक बिंदु काम है, सेक्स है। सेक्स की शक्ति ही प्रेम बनती है। सेक्स का विरोध नहीं है ब्रह्माचर्य, बल्कि सेक्स का ट्रांसफॉर्मेशन है। जो सेक्स का दुश्मन है, वह कभी ब्रह्माचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता। सेक्स ऊर्जा का अधोगमन है, नीचे की तरफ बह जाना है, ब्रह्माचर्य ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन है, ऊपर की तरफ उठ जाना है। 

4 - संभोग का इतना आकर्षण क्षणिक समाधि के लिए है। संभोग से आप उस दिन मुक्त होंगे, जिस दिन आपको समाधि बिना संभोग के हासिल होनी शुरू हो जाएगी।